Share Market Income Tax in Hindi

स्टॉक मार्केट में आप स्टॉक एक्सचेंज पर इक्विटी शेयर्स, इटीएफ(ETF), म्युचूअल फण्ड, ऑप्शन आदि में निवेश कर सकते है। लेकिन बहुत कम ही लोग जानते है कि आप जो भी मार्केट से पैसा कमाते है उस पर आपको इनकम टैक्स भी देना होता है। आज इस लेख में हम share market income tax in hindi पर विस्तार में बात करेंगे।

जब शेयर बाजार में पैसा कमाने की बात आती है तो आप 2 तरह से पैसा कमाते है:

  1. पहला डिविडेंड और
  2. दूसरा शॉर्ट टर्म या लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स

अब इस मुनाफे पर टैक्स किस तरह से लगाया जाता है और कहा-कहा पर आप अपने मुनाफे पर टैक्स देने से बच सकते है, इसके लिए आपको इनकम टैक्स स्लैब्स की जानकारी होनी चाहिये।

शेयर मार्केट में इनकम टैक्स कब लगाया जाता है?

भारत में निवेश पर अलग-अलग स्लेब्स पर अलग – अलग टैक्स अप्लाई होता है – 0%, 5%, 10%, 15%, 20%, 25% और 30%, आगे जानेंगे की आपकी स्टॉक मार्केट से कमाई हुए राशि किस स्लैब में आती है और उसके लिए आपको कितना टैक्स देना होगा।

शेयर मार्केट में बहुत से लोग ट्रेडिंग करते है लेकिन बहुत कम ही लोग जानते है कि आप शेयर्स खरीदने के बाद बेचते हो, तो उस पर आपको टैक्स देना होता है। ये टैक्स अलग-अलग चार्जेज के रुप में होता है। अभी हम शेयर मार्केट में लगने वाले सभी टैक्स के बारे में बात करते है।

इक्विटी पर टैक्स कैसे लगाया जाता है?

जब भी आप किसी कंपनी के शेयर्स में निवेश करते है, तो कम्पाउंडिंग के अनुसार आपको उसमे रिटर्न मिलता हैकंपाउंडिंग क्या है, ये एक तरीका है जिससे आपके निवेषिक राशि में कमाए हुए रिटर्न पर भी आपको इंटरेस्ट प्राप्त होता है। अब अगर आप एक फंडामेंटल स्ट्रांग कंपनी में निवेश कर कम्पाउंडिंग के अनुसार प्रॉफिट कमाते हो तो आपको उस प्रॉफिट पर टैक्स देना होता है फिर चाहे वह प्रॉफिट कैपिटल गेन्स का हो या फिर कंपनी से मिले डिविडेंड का।

अगर हम इक्विटी इंस्ट्रूमेंट्स की बात करे, तो इसमें इक्विटी शेयर्स (Equity Shares) और इक्विटी ओरियनटेड मैचुअल फण्ड (Equity Oriented Mutual Funds) आते है।

कैपिटल गेन्स को दो भागों में विभाजित किया गया है:

1. शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स (STCG)

अगर कोई निवेशक स्टॉक ऐक्सचेंज पर लिस्टेड किसी भी शेयर्स में निवेश करता है और एक साल से पहले ही उन शेयर्स को बेच देता है, अब  अगर उस निवेशक को अपनी इंवेस्टमेंट पर लाभ हुआ है तो उस लाभ पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स (STCG) लगेगा।

वही दूसरी तरफ, अगर निवेशक को नुकसान होता है तो उस पर शॉर्ट टर्म कैपिटल लॉस (STCL) लगता है।

शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स = सेल प्राइस – एक्सपेंसेस ऑन सेल – परचेस प्राइस

इसे समझने के लिए एक उदहारण लेते है, मान लेते है कि किसी कंपनी के आपने 100 शेयर्स 10,000 रुपये में ख़रीदे थे, और 4 महीने बाद वह शेयर्स 15,000 के बेच दिए।

शेयर्स के खरीद और बिक्री में मान लेते है कि आपको 1000 की लागत (ब्रोकरेज, GST, STT, आदि) लगी तो यहाँ पर टोटल कैपिटल गेन हुआ:

=15000 – 10000 – 1000

=4000 रुपये

शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स पर 15% इनकम टैक्स एक्ट, 1961 के सेक्शन 11A के मुताबिक इनकम टैक्स लगता है। ये इनकम टैक्स एक्ट आईटी एक्ट के अंर्तगत आता है।

तो अगर आपकी कमाई हुए राशि का 15% निकला जाये तो वह 600 रुपये होता है।

इसी तरह से आप अपने मुनाफे पर टैक्स की गणना कर सकते है।

2. लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG)

अगर कोई निवेशक स्टॉक ऐक्स्चेंज पर लिस्टेड किसी भी शेयर्स में निवेश कर उन शेयर्स को एक साल के बाद बेचता है और वहां से प्रॉफिट कमाता है तो उस निवेशक के उस लाभ पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) लगता है।

वही दूसरी तरफ, अगर निवेशक को अपने शेयर्स बेचने पर नुकसान होता है तो वह पर लॉन्ग टर्म कैपिटल लॉस (LTCL) लगता है।

अगर आप लंबी अवधि के लिए निवेश करते है तो आपको एक लाख रुपये तक के लाभ पर छूट प्रदान की जाती है। इसके साथ ही अगर आप किसी स्टॉक में निवेश करते है और आप उस स्टॉक से एक लाख रुपये से अधिक लाभ करते है तो आपको भारत सरकार के नियमानुसार लाभ पर 10% टैक्स देना होगा।

2018 के बजट से पहले, जब भी आप अपने इक्विटी शेयर्स या इक्विटी ओरियनटेड मैचुअल फण्ड को एक साल बाद बेचते थे, तो उस पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) लगता था। यानि कि शेयर्स बेचने पर टैक्स लगता है।

टैक्स को लेकर 1 फरवरी 2018 में एक नया प्रोविज़न लाया गया, जिसे  ‘Grandfathering Rule’ कहा जाता है। इक्विटी इंस्ट्रूमेंट्स से कोई भी लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स, जो कि 31 जनवरी 2018 से पहले शेयर्स खरीदे गए है उस पर ‘Grandfathering Rule’ के अनुसार टैक्स की गणना होगी।

ग्रैंडफादरिंग नियम  के अनुसार 31 जनवरी तक बने LTCG प्रभावित नहीं होंगे। यह सिर्फ उस तारीख के बाद किए गए लाभ पर लगेगा।

उदाहरण, राहुल ने 30 सितम्बर 2016 में स्टॉक ऐक्सचेंज पर लिस्टेड किसी भी कंपनी का एक शेयर खरीदा, जिसकी प्राइस उस समय 100 थी और 31 जनवरी 2018 को उस शेयर की प्राइस 160 रुपये हो जाती थी एंव अभी राहुल उस शेयर को 200 रुपये में बेच देता है। अभी राहुल के बेचे गए शेयर्स पर 40 रुपये का लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) लगता है (यानि कि 200 – 160), जबकि उसका वास्तविक लाभ 100 रुपये है।

कैपिटल गैन और कैपिटल लॉस का कॉन्सेप्ट

परचेस प्राइस (Purchase Price) < सेल प्राइस (Sell Price) = कैपिटल गैन (Capital Gain)

परचेस प्राइस (Purchase Price) > सेल प्राइस (Sell Price) = कैपिटल लॉस (Capital Loss)


इक्विटी शेयरो से नुकसान पर इनकम टैक्स

फायदे पर टैक्स लगाया ही जाता है लेकिन अगर आपको ट्रेडिंग या निवेश करने पर नुकसान हो तो वहां पर टैक्स की गणना किस प्रकार की जाती है?

अब जिस तरह से ट्रेडिंग पीरियड के आधार पर शार्ट टर्म और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन होता है उसी तरह से शार्ट टर्म और लॉन्ग टर्म कैपिटल लॉस भी अलग-अलग होते है।

1. शॉर्ट टर्म कैपिटल लॉस

कोई भी लॉस, जो इक्विटी शेयरो के बेचने से हुआ है चाहे वह शॉर्ट टर्म लॉस हो फिर लॉन्ग टर्म लॉस हो, उसके खिलाफ ऑफसेट किया जाता है। यदि नुकसान को पूरी तरह से समायोजित नही किया जाता है तो यह आठ वर्षो के लिए आगे बढ़ा दिया जाता है।

इन आठ वर्षो के दौरान किसी भी शॉर्ट टर्म या लॉन्ग टर्म कैपिटल गैन के विरुध्द समायोजित किया जा सकता है।

यह एक निवेशक को समझना जरुरी है कि आप अपने नुकसान को तभी केरी फॉर्वर्ड (Carry Forward) कर सकते है, जब आप अंतिम तिथि से पहले इनकम टैक्स रिटर्न भर देते है। इसलिए भले ही आपकी एक वर्ष में अर्जित इनकम, टैक्स आय से कम हो, फिर भी आपको अपने नुकसान को केरी फॉरवर्ड करने के लिए इनकम टैक्स रिटर्न भरना आवश्यक है।

2. लॉन्ग टर्म कैपिटल लॉस

2018 बजट से पहले, इक्विटी शेयर्स से लॉन्ग टर्म कैपिटल लॉस, डेड लॉस (Dead Loss) में Consider किया जाता था – इसे न तो ऐडजस्ट किया जा सकता था और न ही केरी फॉरवर्ड किया जा सकता है।

2018 बजट के बाद, अगर निवेशक को नुकसान होता है तो उस नुकसान को आगे केरी फॉरवर्ड किया जायेगा।


सिक्योरिटीज ट्राजेंशन टैक्स । Securities Transaction Tax (STT)

स्टॉक एक्सचेंज पर सभी इक्विटी शेयर्स खरीदने और बेचने पर STT लगता है। STT भारतीय एक्ट 111A और 112A के अंर्तगत आता है।

हालंकि, यदि किसी कारणवश  STT लेन देन के अधीन नही आता है तो शॉर्ट टर्म गेन पर निवेशको पर लागू स्लैब के अनुसार टैक्स लगाया जायेगा, जबकि लॉन्ग टर्म गेन पर आईटी अधिनियम की धारा 112 के अनुसार 10% से 20% टैक्स लगाया जायेगा।

डिविडेंड पर टैक्स कैसे लगाया जाता है?

अगर आप स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड कंपनी पर निवेश करते है तो कंपनी अपने लाभ से अपने शेयरहोल्डर्स को डिविडेंड देती है, यह पूरी तरह से कंपनी पर निर्भर करता है कि वह कंपनी अपने शेयरहोल्डर्स को डिविडेंड देनी चाहती है या नही।

स्टॉक एक्सचेंज पर ऐसी बहुत से कंपनियां है जो अपने शेयरहोल्डर्स को हर साल डिविडेंड देती है वही दूसरी ऐसी भी बहुत सी कंपनियां है जो शेयरहोल्डर्स को डिविडेंड न देकर, उस लाभ को कंपनी के विस्तार के लिए उपयोग करती है।

किसी कंपनी के द्वारा अपने शेयरहोल्डर्स को जो डिविडेंड दिया जाता है उस भी आपको टैक्स देना होता है।

यह टैक्स आपके अर्जित लाभ पर इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार होता है। आप पूरे फानेंशियल ईयर में डिविडेंड पर जो भी टैक्स देते हो, उसको से 10% TDS Benefit में क्रेडिट हो जाता है।

Debt Securities पर टैक्स कैसे लगाया जाता है?

Debt इंस्ट्रूमेंट्स फिक्स्ड इनकम वैज्ड सिक्योंरिटिज होती है जैसे कि सरकारी सिक्योरिटीज, डिवेंचर, कॉर्परेट बॉन्ड्स और Debt ओरिएंटेड म्यूचुअल फंड्स।

डिवेंचर, कॉर्परेट बॉन्ड्स जैसे लिस्टेड सिक्योरिटी इंस्ट्रूमेंट्स के मामले में, शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म कैपिटल के वर्गीकरण होल्डिंग पीरियड थ्रेशोल्ड 12 महिने होता है।

अगर Debt इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश 12 महीने से कम के लिए होता है तो वह शोर्ट टर्म कैपिटल गैन माना जायेगा और अगर निवेश 12 महीने से ज्यादा के लिए रहता है तो वह लॉन्ग टर्म गैन के अंर्तगत आता है।

Debt इंस्ट्रूमेंट्स पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गैन इनकम टैक्स स्लैव के अनुसार लगाया जाता है जबकि लॉन्ग टर्म कैपिटल गैन आईटी की धारा 112 के अंर्तगत आता है। ये टैक्स 20% या 10% हो सकता है, इसमें आप चुन सकते है जो आपके लिए अधिक फायदेमंद हो।

हालांकि, सरकार द्वारा जारी बांड या सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड स्कीम, 2015 या जीरो कूपन बॉन्ड के तहत भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड को छोड़कर सभी डिबेंचर या बॉन्ड के मामले में इंडेक्सेशन का लाभ उपलब्ध नहीं है।

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड से एक निवेशक द्वारा अर्जित लाभ को आईटी अधिनियम की धारा 47 (viic) के तहत कैपिटल गैन टैक्स में छूट दी गई है, यानी केवल तभी जब ऐसे बांडों को बेचा जाता है।

हालांकि, ये स्टॉक एक्सचेंज में स्थानांतरण से होने वाले कैपिटल गैन के अंर्तगत आता हैं।

डेरिवेटिव पर टैक्स कैसे लगाया जाता है?

डेरिवेटिव इंस्ट्रूमेंट्स वह इंस्ट्रूमेंट्स है जिनकी वैल्यु एक या एक से अधिक अंडरलाईंग ऐसेट से डिराइव की जाती है।

वह अंडरलाइग ऐसेट कमोडिटी, कंरेसी, मेटल और वॉन्ड भी हो सकते है। डेरिवेटिव पूरी तरह से अपने अंडरलाईंग ऐसेट पर निर्भर रहता है अगर उस ऐसेट का प्राइस बढ़ेगा, तभी डेरिवेटिव की प्राइस बढ़ेगा।

आईटी की धारा 43(5) के अनुसार, डेरिवेटिव ट्रेडिंग से किए गए लाभ पर भी टैक्स लागु होगा, जोकि आपके लाभ पर स्लैव के अनुसार लगाया जायेगा। स्लैव के बारे में पहले ही बताया जा चुका कि किस – किस दर से टैक्स लगता है।

निष्कर्ष

निवेशको को शेयर मार्केट इनकम टैक्स के वारे में ज्यादा जानकारी नही है इसलिए हमने शेयर मार्केट इनकम टैक्स से जुड़े हर एक पहलू को कवर किया है। अब जब भी निवेश करे तो इनकम टैक्स केबारे में जागरुक रहे, जिसके कि आपके निवेश पर अर्जित लाभ पर ज्यादा प्रभाव न पड़े।

स्टॉक मार्केट में निवेश करना आपको पैसे कमाने का एक अद्भुत मौका प्रदान करती है लेकिन आपका नेट प्रॉफिट शेयर बाजार के खर्चे और टैक्स देने के बाद ही जाना जा सकता है, इसलिए आवश्यक है कि आप इन सब खर्चो और टैक्स की जानकारी प्राप्त करे और उसके अनुसार हे निवेश करें।

एक बेहतर समझ के लिए आप स्टॉक मार्केट कोर्स ले सकते है या स्टॉक मार्केट से जुड़ी किताबे पढ़ सकते है।

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